6 Oct 2018

टॉप पर पहुंचकर क्यों हुआ फ़िल्मों से मोहभंग, जानिये...



6 अक्टूबर को अपने समय के सबसे हैंडसम अभिनेताओं में गिने जाने वाले विनोद खन्ना का जन्मदिन होता है। आज वो हमारे बीच होते तो अपना 72 वां जन्मदिन मना रहे होते! एक ज़बरदस्त और तूफानी अभिनेता 27 अप्रैल 2017 को कैंसर से लड़ाई में हार गया था। लेकिन, अपने स्टाइल और कामों की वजह से वो हमेशा याद आते रहेंगे। आइये उनकी जयंती पर जानते हैं उनसे जुड़ी कुछ ख़ास बातें!

विनोद खन्ना अभिनेताओं की उसी पीढ़ी से आते हैं जो अविभाजित भारत के पाकिस्तान में जन्में थे। खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 पेशावर में हुआ। वहां उनके पिता का टेक्सटाइल, डाई और केमिकल का बिजनेस था। विनोद खन्ना पांच भाई बहनों ( 2 भाई, 3 बहनें) में से एक थे। आजादी के समय हुए बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान से मुंबई आकर बस गया।

कहा जाता है कि विनोद खन्ना के पिता ये बिल्कुल भी नहीं चाहते थे कि उनका बेटा फ़िल्मों में काम करे। लेकिन, यह विनोद की ज़िद थी कि वो फ़िल्मों में ही जायेंगे। उन्होंने इसके लिए अपने पिता से सिर्फ दो साल मांगे और उन्होंने दो साल का समय विनोद को दे भी दिया। युवा विनोद ने इन दो सालों में कड़ी मेहनत की और बतौर अभिनेता खुद को स्थापित कर लिया!





विनोद को सबसे पहले सुनील दत्त ने ‘मन का मीत’ (1968) में विलेन के रूप में मौका दिया। हीरो के रूप में स्थापित होने के पहले विनोद ने ‘आन मिलो सजना’, ‘पूरब और पश्चिम’, ‘सच्चा झूठा’ जैसी फ़िल्मों में सहायक या खलनायक के रूप में काम किया। गुलजार द्वारा निर्देशित ‘मेरे अपने’ (1971) से विनोद खन्ना को ख़ासी लोकप्रियता मिली और जैसे वहां से उनका समय शुरू हो गया। मल्टीस्टारर फ़िल्मों से विनोद को कभी परहेज नहीं रहा और वे उस दौर के स्टार्स अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, सुनील दत्त आदि के साथ लगातार फ़िल्में करते रहे।

अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना की जोड़ी को दर्शकों ने काफी पसंद किया। ‘हेराफेरी’, ‘खून पसीना’, ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’ जैसी फ़िल्में ब्लॉकबस्टर साबित हुईं। सक्सेस मिलने के बाद 1982 में विनोद खन्ना ने अचानक विनोद अपने आध्यात्मिक गुरु रजनीश (ओशो) की शरण में चले गए और ग्लैमर की दुनिया को उन्होंने अलविदा कह दिया। विनोद के करीबी बताते हैं कि उनमें इंडस्ट्री को लेकर एक बेचैनी रहती थी और कहीं न कहीं उन्हें इंडस्ट्री में सब नकली सा लगने लगा था। जीवन का जैसे उन्हें एक बोध सा हो गया था कि सब माया है।

बहरहाल, विनोद के अचानक इस तरह से चले जाने के कारण उनकी पत्नी गीतांजली नाराज हुई और दोनों के बीच तलाक हो गया। विनोद और गीतांजली के दो बेटे अक्षय और राहुल खन्ना हैं। लेकिन, फ़िल्मों के प्रति विनोद का लगाव उन्हें फिर से फ़िल्मों में खींच लाया और 1987 में उन्होंने ‘इंसाफ’ फ़िल्म से वापसी की। चार-पांच साल तक नायक बनने के बाद विनोद धीरे-धीरे चरित्र भूमिकाओं की ओर मुड़ गए। 1990 में विनोद ने कविता से शादी की। कविता और विनोद का एक बेटा साक्षी और बेटी श्रद्धा है।

विनोद खन्ना अभिनेता होने के अलावा, निर्माता और सक्रिय राजनेता भी रहे हैं। वे भाजपा के सदस्य थे और कई चुनाव जीत चुके थे। वे मंत्री भी रहे। 2015 में शाह रुख़ ख़ान की फ़िल्म दिलवाले’ में नजर आने के बाद उन्होंने बीते साल अप्रैल में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘एक थी रानी ऐसी भी’ में भी अभिनय किया था। यह उनकी आखिरी फ़िल्म थी, जो राजमाता विजय राजे सिंधिया पर बनी थी जिसे गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने लिखा था! 1999 में विनोद खन्ना को उनके इंडस्ट्री में योगदान के लिए फ़िल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाज़ा गया था।

Source - Jagran 

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