अध्याय 3 — बॉलीवुड में प्रवेश: काई पो छे! से एम.एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी तक
टेलीविजन की पहचान से बड़े पर्दे की चुनौती
सुशांत सिंह राजपूत के जीवन में वर्ष 2013 एक निर्णायक मोड़ लेकर आया। टेलीविजन पर लोकप्रियता प्राप्त करने के बाद अब वे हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बनाने जा रहे थे। यह परिवर्तन केवल माध्यम बदलने का मामला नहीं था। फिल्मों में उन्हें एक नए दर्शक वर्ग के सामने स्वयं को साबित करना था, जहाँ सफलता का मूल्यांकन अभिनय, कहानी, निर्देशन, व्यावसायिक प्रदर्शन और आलोचनात्मक प्रतिक्रिया जैसे अनेक आधारों पर होता है।
टेलीविजन पर मानव देशमुख के रूप में पहचाने जाने वाले सुशांत को अब दर्शकों को यह विश्वास दिलाना था कि उनकी प्रतिभा किसी एक लोकप्रिय पात्र तक सीमित नहीं है। वे अलग-अलग प्रकार की भूमिकाएँ निभा सकते हैं और बड़े पर्दे पर भी अपनी स्वतंत्र पहचान बना सकते हैं।
उनकी पहली प्रमुख हिंदी फिल्म काई पो छे! इसी चुनौती का उत्तर बनी।
काई पो छे! — तीन दोस्तों की कहानी और एक नए अभिनेता की शुरुआत
अभिषेक कपूर द्वारा निर्देशित काई पो छे! वर्ष 2013 में प्रदर्शित हुई। चेतन भगत के उपन्यास The 3 Mistakes of My Life से प्रेरित इस फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत ने ईशान भट्ट की भूमिका निभाई। उनके साथ राजकुमार राव और अमित साध ने भी प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं।
फिल्म की कहानी दोस्ती, महत्वाकांक्षा, क्रिकेट, सामाजिक तनाव और व्यक्तिगत निर्णयों के बीच आगे बढ़ती है। ईशान एक ऐसा पात्र है जो क्रिकेट के प्रति जुनून रखता है और युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने में रुचि लेता है। उसके व्यक्तित्व में उत्साह के साथ-साथ आवेग और भावनात्मक जटिलताएँ भी हैं।
सुशांत के सामने इस भूमिका की चुनौती यह थी कि उन्हें एक ऐसे युवक को विश्वसनीय बनाना था जिसके सपने बड़े हैं, लेकिन जिसका स्वभाव हमेशा संतुलित नहीं रहता। पात्र की ऊर्जा और उसकी कमजोरियों के बीच संतुलन बनाए रखना किसी भी अभिनेता के लिए महत्वपूर्ण होता है।
काई पो छे! को समीक्षकों से सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ मिलीं और सुशांत के अभिनय को भी ध्यान दिया गया। इस फिल्म ने उन्हें केवल टेलीविजन से आए कलाकार के रूप में देखने की धारणा को चुनौती देने का अवसर दिया।
उनके फिल्मी करियर की शुरुआत में ही यह संकेत मिल गया कि वे मुख्यधारा के मनोरंजन से आगे बढ़कर ऐसी कहानियों का हिस्सा बनना चाहते हैं जिनमें चरित्र और सामाजिक परिवेश दोनों का महत्व हो।
शुद्ध देसी रोमांस — युवा प्रेम की बदलती तस्वीर
उसी वर्ष प्रदर्शित शुद्ध देसी रोमांस में सुशांत ने रघु की भूमिका निभाई। फिल्म में उनके साथ परिणीति चोपड़ा और वाणी कपूर थीं।
यह फिल्म प्रेम, विवाह, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच उलझे युवाओं की कहानी प्रस्तुत करती है। रघु का चरित्र ऐसे व्यक्ति का है जो प्रेम और प्रतिबद्धता को लेकर निश्चित नहीं है। वह आकर्षण, असमंजस और निर्णय लेने की कठिनाई के बीच आगे बढ़ता है।
काई पो छे! के ईशान और शुद्ध देसी रोमांस के रघु में स्पष्ट अंतर था। एक पात्र में खेल और दोस्ती से जुड़ी ऊर्जा अधिक दिखाई देती है, जबकि दूसरे में भावनात्मक अनिश्चितता और संबंधों को लेकर असमंजस महत्वपूर्ण है।
इन भूमिकाओं ने सुशांत को अलग-अलग तरह के युवा पात्र निभाने का अवसर दिया। साथ ही, उन्होंने यह भी दिखाया कि वे केवल आदर्श नायक की छवि में बँधकर नहीं रहना चाहते थे।
हालाँकि किसी कलाकार की विविधता का मूल्यांकन कुछ शुरुआती फिल्मों के आधार पर अंतिम रूप से नहीं किया जा सकता, लेकिन ये भूमिकाएँ उनके करियर के विकास को समझने में उपयोगी हैं।
पीके — छोटी भूमिका, लेकिन बड़ी फिल्म
वर्ष 2014 में सुशांत सिंह राजपूत आमिर खान अभिनीत फिल्म पीके में दिखाई दिए। उन्होंने सरफराज यूसुफ की भूमिका निभाई, जो जग्गू अर्थात् जगत जननी (अनुष्का शर्मा) की कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
फिल्म धर्म, आस्था, सामाजिक रूढ़ियों और मनुष्य की सोच पर व्यंग्य करती है। सुशांत की भूमिका पूरी फिल्म पर केंद्रित नहीं थी, लेकिन उनके पात्र के माध्यम से प्रेम, गलतफहमी और सामाजिक पहचान से जुड़ा एक भावनात्मक प्रसंग सामने आता है।
यहाँ उनके करियर का एक और पहलू दिखाई देता है। किसी अभिनेता का योगदान केवल फिल्म में स्क्रीन पर बिताए गए समय से नहीं आँका जा सकता। कभी-कभी सीमित समय वाला पात्र भी कहानी के भावनात्मक प्रभाव को बढ़ाता है।
पीके की सफलता ने सुशांत को बड़े सितारों और बड़े बजट की फिल्म के संसार में काम करने का अनुभव दिया। साथ ही, यह उनके करियर में विविध भूमिकाओं की एक और कड़ी थी।
डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी! — लोकप्रियता से अलग रास्ता
वर्ष 2015 में निर्देशक दिबाकर बनर्जी की फिल्म डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी! प्रदर्शित हुई। इसमें सुशांत ने प्रसिद्ध काल्पनिक जासूस ब्योमकेश बख्शी की भूमिका निभाई। यह पात्र बंगाली साहित्यकार शरदिंदु बंद्योपाध्याय की रचनाओं से जुड़ा है। फिल्म की पृष्ठभूमि 1940 के दशक का कलकत्ता है।
यह भूमिका उनके पहले के लोकप्रिय युवा पात्रों से अलग थी। ब्योमकेश केवल एक आकर्षक नायक नहीं, बल्कि निरीक्षण करने वाला, प्रश्न पूछने वाला और परिस्थितियों के पीछे छिपे सत्य तक पहुँचने का प्रयास करने वाला व्यक्ति है।
ऐसे पात्र के लिए संवाद बोलना ही पर्याप्त नहीं होता। अभिनेता को चेहरे के भावों, आवाज के उतार-चढ़ाव, शारीरिक भाषा और सोचने के तरीके के माध्यम से पात्र की विशिष्टता स्थापित करनी पड़ती है।
फिल्म को आलोचनात्मक स्तर पर सराहना मिली, लेकिन उसका व्यावसायिक प्रदर्शन अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा।
यह अंतर महत्वपूर्ण है। किसी फिल्म की व्यावसायिक सफलता और उसके कलात्मक गुण एक ही चीज नहीं हैं। कोई फिल्म टिकट खिड़की पर असफल हो सकती है, फिर भी उसमें अभिनय, निर्देशन या कहानी के ऐसे पहलू हो सकते हैं जिनकी बाद में सराहना की जाए।
सुशांत के करियर में यह फिल्म इसलिए उल्लेखनीय है कि उन्होंने केवल लोकप्रिय रोमांटिक नायक की छवि पर निर्भर रहने के बजाय एक जटिल, रहस्यप्रधान पात्र निभाने का जोखिम लिया।
एम.एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी — करियर का निर्णायक पड़ाव
वर्ष 2016 में प्रदर्शित नीरज पांडे की फिल्म एम.एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी सुशांत सिंह राजपूत के करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जाती है। इसमें उन्होंने भारतीय क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी की भूमिका निभाई।
इस भूमिका की चुनौती किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की तरह दिखाई देना भर नहीं थी। धोनी देश के सबसे पहचाने जाने वाले क्रिकेटरों में से एक थे। दर्शकों के मन में उनकी बल्लेबाजी, विकेटकीपिंग, चलने के तरीके, बोलने की शैली और मैदान पर उनके व्यवहार की स्पष्ट छवि पहले से मौजूद थी।
इसलिए सुशांत को केवल एक काल्पनिक चरित्र नहीं निभाना था, बल्कि वास्तविक व्यक्ति के जीवन पर आधारित भूमिका में विश्वसनीयता स्थापित करनी थी।
भूमिका के लिए तैयारी
फिल्म के प्रचार के दौरान जारी आधिकारिक प्रशिक्षण वीडियो में सुशांत की क्रिकेट अभ्यास से जुड़ी तैयारी दिखाई गई थी। वीडियो के विवरण के अनुसार, उनकी तैयारी में कई महीनों का श्रम शामिल था।
इस तरह की भूमिका के लिए शारीरिक अभ्यास, क्रिकेट की तकनीक, बल्लेबाजी के संतुलन, विकेटकीपिंग की गतिविधियों और कैमरे के सामने उन्हें स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत करने पर काम करना आवश्यक था।
यहाँ अभिनय का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है: जब किसी पात्र का वास्तविक जीवन में प्रसिद्ध व्यक्तित्व मौजूद हो, तब दर्शक अभिनय की तुलना सीधे उस व्यक्ति से करते हैं। छोटी-सी असंगति भी दिखाई दे सकती है। इसीलिए ऐसी भूमिका के लिए केवल प्रतिभा नहीं, बल्कि व्यवस्थित तैयारी और लगातार अभ्यास की जरूरत होती है।
धोनी की यात्रा और सुशांत का अभिनय
फिल्म धोनी के शुरुआती जीवन, रेलवे में नौकरी, क्रिकेट के प्रति समर्पण, चयन की कठिनाइयों और भारतीय टीम तक पहुँचने की यात्रा को प्रस्तुत करती है।
इस कहानी का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि सफलता हमेशा एक सीधी रेखा में नहीं आती। किसी व्यक्ति को अपनी क्षमता साबित करने के लिए बार-बार अवसर तलाशने पड़ सकते हैं। प्रतिभा होने के बावजूद उचित अवसर, प्रशिक्षण, परिस्थितियाँ और समय भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सुशांत के अपने जीवन में भी एक अलग क्षेत्र में इसी प्रकार का परिवर्तन दिखाई देता है। उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई से अभिनय की ओर कदम बढ़ाया, टेलीविजन में पहचान बनाई और फिर फिल्मों में अलग-अलग भूमिकाओं के माध्यम से स्वयं को साबित करने का प्रयास किया।
इस समानता को दोनों व्यक्तियों के जीवन को एक जैसा मानने के लिए नहीं, बल्कि उनके संघर्षों के बीच एक सीमित और अर्थपूर्ण संबंध के रूप में देखना चाहिए।
इस फिल्म ने क्या बदला?
एम.एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी ने सुशांत को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुँचाया और उनके करियर में एक मजबूत पहचान स्थापित की। फिल्म की लोकप्रियता ने यह भी दिखाया कि वे वास्तविक जीवन के प्रसिद्ध व्यक्तित्व पर आधारित भूमिका को निभाने की चुनौती स्वीकार कर सकते हैं।
उनके अभिनय की चर्चा में इस फिल्म को विशेष स्थान मिलता है। फिर भी उनके पूरे करियर का मूल्यांकन केवल इसी फिल्म के आधार पर करना उचित नहीं होगा। उनकी दूसरी फिल्मों में दिखाई देने वाली विविधता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
रोमांस, प्रयोग और अलग-अलग भूमिकाओं का दौर
एम.एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी के बाद सुशांत ने कई तरह की फिल्मों में काम किया। इनमें रोमांस, सामाजिक विषय, ऐतिहासिक परिवेश और गंभीर चरित्र-प्रधान कहानियाँ शामिल थीं।
### राब्ता — प्रेम और पुनर्जन्म की कल्पना
2017 में प्रदर्शित राब्ता में सुशांत सिंह राजपूत ने कृति सेनन के साथ काम किया। फिल्म में प्रेम, नियति और पुनर्जन्म की कल्पना को आधुनिक कहानी के साथ जोड़ा गया।
फिल्म को व्यावसायिक और आलोचनात्मक स्तर पर मिली प्रतिक्रिया मिश्रित रही।
यह फिल्म उनके करियर का ऐसा उदाहरण है जहाँ एक प्रमुख अभिनेता की मौजूदगी और रोमांटिक कहानी अपने आप सफलता की गारंटी नहीं बन सकीं। फिल्म का अंतिम प्रभाव कहानी, पटकथा, निर्देशन और दर्शकों की प्रतिक्रिया जैसे कई तत्वों पर निर्भर करता है।
केदारनाथ — प्रेम और सामाजिक विभाजन
2018 की फिल्म केदारनाथ में सुशांत ने मंसूर खान की भूमिका निभाई। फिल्म की कहानी उत्तराखंड के केदारनाथ क्षेत्र की पृष्ठभूमि में प्रेम, सामाजिक अंतर और प्राकृतिक आपदा को जोड़ती है।
इस फिल्म में उनके पात्र का सामाजिक परिवेश और उसके सामने आने वाली चुनौतियाँ महत्वपूर्ण हैं। कहानी यह दिखाती है कि व्यक्तिगत संबंध केवल दो व्यक्तियों के बीच का विषय नहीं होते; वे कई बार परिवार, समाज और धार्मिक-सांस्कृतिक धारणाओं से भी प्रभावित होते हैं।
फिल्म की व्यावसायिक प्रतिक्रिया मिश्रित रही, लेकिन इसने सुशांत को एक और अलग परिवेश वाले चरित्र में प्रस्तुत किया।
सोनचिड़िया — चंबल की दुनिया में एक कठिन भूमिका
2019 में आई सोनचिड़िया उनके करियर की उल्लेखनीय चरित्र-प्रधान फिल्मों में से एक है। अभिषेक चौबे के निर्देशन में बनी यह फिल्म चंबल के बीहड़ों, डकैतों की दुनिया, सामाजिक परिस्थितियों और नैतिक दुविधाओं को प्रस्तुत करती है। सुशांत ने इसमें लखन सिंह, जिसे लखना भी कहा जाता है, की भूमिका निभाई।
यह भूमिका उनके पहले के शहरी और रोमांटिक पात्रों से अलग थी। इसमें कठोर परिवेश, हिंसा, भय, समूह के प्रति निष्ठा और अपने निर्णयों को लेकर आंतरिक संघर्ष जैसे पहलू थे।
फिल्म को आलोचनात्मक सराहना मिली, लेकिन इसका व्यावसायिक प्रदर्शन सीमित रहा।
इससे एक व्यापक प्रश्न सामने आता है: क्या किसी कलाकार की सफलता केवल उन फिल्मों से तय की जानी चाहिए जो बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन करती हैं?
व्यावसायिक सफलता फिल्म उद्योग के लिए आवश्यक है, क्योंकि इससे निवेश, रोजगार और भविष्य की परियोजनाओं पर प्रभाव पड़ता है। लेकिन कलात्मक दृष्टि से किसी फिल्म का मूल्यांकन उसकी कहानी, अभिनय, निर्देशन, सामाजिक दृष्टि और समय के साथ उसके प्रभाव को भी ध्यान में रखकर किया जा सकता है।
सोनचिड़िया इस अंतर को समझने के लिए एक उपयोगी उदाहरण है।
छिछोरे — असफलता को समझने वाली कहानी
2019 में प्रदर्शित नितेश तिवारी की फिल्म छिछोरे में सुशांत ने अनिरुद्ध पाठक, जिन्हें अन्नी कहा जाता है, की भूमिका निभाई। फिल्म कॉलेज जीवन, मित्रता, प्रतियोगिता, असफलता और जीवन के प्रति दृष्टिकोण जैसे विषयों को सामने लाती है।
फिल्म की कहानी में एक पिता और उसके बेटे के संबंध के माध्यम से यह प्रश्न उठता है कि क्या परीक्षा में असफल होना जीवन में असफल हो जाना है।
इस प्रश्न का उत्तर फिल्म स्पष्ट रूप से नकारात्मक दिशा में देती है। जीवन की गुणवत्ता और व्यक्ति का मूल्य केवल अंकों, पदों, पुरस्कारों या दूसरों की अपेक्षाओं से निर्धारित नहीं होते।
सुशांत की भूमिका इस विचार को कहानी के भावनात्मक केंद्र तक पहुँचाती है। फिल्म ने व्यावसायिक स्तर पर भी अच्छा प्रदर्शन किया और उनकी लोकप्रिय फिल्मों में शामिल हुई।
इस फिल्म की सीख को सुशांत के जीवन पर सीधे लागू करके कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। किसी अभिनेता द्वारा असफलता पर आधारित पात्र निभाना उसके अपने निजी अनुभवों या मानसिक स्थिति का प्रमाण नहीं है। कला और कलाकार के निजी जीवन को अलग-अलग समझना आवश्यक है।
फिर भी, यह फिल्म एक स्वतंत्र सामाजिक संदेश देती है—युवाओं को उनकी उपलब्धियों के साथ-साथ उनके मानवीय मूल्य के आधार पर भी देखना चाहिए।
### सुशांत के फिल्मी करियर का निष्पक्ष मूल्यांकन
उनकी फिल्मोग्राफी को एक साथ देखने पर तीन प्रमुख विशेषताएँ दिखाई देती हैं।
पहली, उन्होंने केवल एक तरह की भूमिका तक सीमित रहने के बजाय अलग-अलग चरित्रों को अपनाने का प्रयास किया। दूसरी, उन्होंने लोकप्रिय व्यावसायिक फिल्मों और अपेक्षाकृत जोखिमपूर्ण, चरित्र-प्रधान परियोजनाओं—दोनों में काम किया। तीसरी, उनके करियर में सफल फिल्मों के साथ ऐसी फिल्में भी रहीं जिन्हें दर्शकों या बॉक्स ऑफिस से अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली।
यह किसी भी अभिनेता के करियर का सामान्य, लेकिन महत्वपूर्ण सच है। कोई भी कलाकार हर भूमिका में समान सफलता प्राप्त नहीं करता। फिल्म की सफलता में अभिनेता के अलावा पटकथा, निर्देशन, संपादन, संगीत, प्रचार, रिलीज का समय और दर्शकों की पसंद जैसे अनेक कारक योगदान देते हैं।
इसलिए सुशांत के करियर की निष्पक्ष समीक्षा में न तो उनकी हर फिल्म को असाधारण घोषित करना उचित होगा, न ही किसी असफल फिल्म को उनकी प्रतिभा की असफलता मान लेना।
उनकी वास्तविक उपलब्धि यह थी कि उन्होंने अपेक्षाकृत कम समय में अलग-अलग प्रकार के पात्र निभाए और कुछ ऐसी फिल्मों का हिस्सा बने जो आज भी उनके अभिनय की चर्चा में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
निष्कर्ष
सुशांत सिंह राजपूत की बॉलीवुड यात्रा केवल सफलता की कहानी नहीं थी। इसमें अवसर मिले, नई चुनौतियाँ सामने आईं, कुछ फिल्मों ने व्यापक लोकप्रियता हासिल की और कुछ प्रयोग अपेक्षित व्यावसायिक परिणाम नहीं दे पाए।
काई पो छे! ने उनके फिल्मी करियर की शुरुआत को मजबूत आधार दिया। पीके ने उन्हें बड़े सितारों के साथ काम करने का अनुभव दिया। डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी! ने अलग तरह की भूमिका निभाने का अवसर दिया। एम.एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी ने उनकी पहचान को व्यापक बनाया। सोनचिड़िया और छिछोरे ने अलग-अलग प्रकार की कहानियों में उनके अभिनय की संभावनाएँ सामने रखीं।
उनकी यात्रा से मिलने वाली सीख यह है कि किसी कलाकार का मूल्यांकन एक फिल्म, एक पुरस्कार या एक व्यावसायिक परिणाम से नहीं किया जाना चाहिए। उसके पूरे काम, चुनी गई भूमिकाओं, तैयारी, प्रयोगों और सांस्कृतिक प्रभाव को साथ रखकर देखना अधिक न्यायसंगत है।
अगला अध्याय — अभिनय से आगे का सुशांत: विज्ञान, अंतरिक्ष, ज्ञान और बड़े सपनों की दुनिया।
इसमें हम उनके सार्वजनिक रूप से ज्ञात वैज्ञानिक और शैक्षणिक रुचियों, उनके साझा किए गए लक्ष्यों, सीखने की आदतों और उनके व्यक्तित्व के बारे में प्रचलित धारणाओं की तथ्यात्मक जाँच करेंगे। उद्देश्य यह समझना होगा कि पर्दे पर दिखने वाले अभिनेता के अलावा उनके बौद्धिक जीवन के बारे में विश्वसनीय रूप से क्या जाना जा सकता है।