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भागलपुर के दादामुनि


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हिंदी फिल्मों के विकास में अतुल्य योगदान देने वाले स्व. अशोककुमार -जिन्हें दादामुनि भी कहा जाता था- जब छात्र थे, तो हर वर्ष अपने भाई-बहनों के साथ गर्मी की छुट्टियां नाना सतीशचंद्र बनर्जी के भागलपुर स्थित राजबाटी हवेली में ही बिताते थे। भागलपुर के प्रथम बैरिस्टर रायबहादुर राजा शिवचंद्र बनर्जी उनके परनाना थे। उनके राजसी ठाठ थे। उनके पुत्र व प्रसिद्ध जमींदार कुमार सतीशचंद्र बनर्जी उनके नाना थे।

अशोक कुमार की भतीजी व तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर मनोविज्ञान विभाग में प्रोफेसर पद पर कार्यरत डॉ. रत्ना मुखर्जी बताती हैं, अशोक कुमार की माता थीं लूना बनर्जी। 13 अक्टूबर 1911 को अशोक कुमार का जन्म राजा शिवचंद्र बनर्जी के आदमपुर स्थित भव्य राजबाटी नामक बंगले के श्याम-घर में हुआ था। यह कमरा चमचमाते काले संगमरमर से डेकोरेटेड होने के कारण श्याम-घर कहलाता था। दादामुनि का बचपन तो यहां बीता ही था, किशोरावस्था और युवावस्था में भी वे गर्मी की छुट्टियां मां के साथ यहीं बिताते थे। यह क्रम 1918 से 1943 तक चला। फिर फिल्मों में व्यस्तता बढ़ गई, तब अवसर मिलने पर वे यदा-कदा ही यहां आ पाते थे।

लूना बनर्जी के पिता ने राजबाटी का एक खूबसूरत भवन उन्हें दहेज में दिया था। लूना के पति एडवोकेट कुंजलाल बिहारी जब खंडवा से पत्नी और बच्चों के साथ यहां आते, तो उसी भवन में रहते थे, लेकिन उन्होंने उसका मालिकाना हक नहीं लिया। लूना बनर्जी घर की बड़ी पुत्री थीं। उस समय प्रथम प्रसव ननिहाल में ही होने का रिवाज था। अशोक कुमार ननिहाल के पहले नाती थे। इसलिए जब उनका जन्म हुआ, तो राजबाटी आतिशबाजियों, शहनाई और पुत्र जन्म के गीतों से गूंज उठा था। नाना ने खूब दान दिया। उनकी देख-रेख के लिए कोलकाता से डॉक्टर व नर्स बुलाए गए थे।

अशोक कुमार के परनाना रायबहादुर शिवचंद्र बनर्जी पश्चिम बंगाल के वर्दमान जिले से भागलपुर आकर स्थानीय आदमपुर में बसे थे। उन्होंने लंदन से बैरिस्ट्री की थी और कई मुकदमों में विक्टोरिया सल्तनत को जीत दिलाकर अंग्रेज सरकार के खास बन गए थे। यही कारण था कि ब्रितानी सरकार ने उन्हें रायबहादुर की पदवी से नवाजा था। यहां वे रायबहादुर राजा शिवचंद्र बनर्जी के नाम से लोकप्रिय थे। आज के आदमपुर मुहल्ले का एक विस्तृत हिस्से पर उन्हीं की मिल्कियत थी, जो गंगा घाट स्थित शिवालय से आदमपुर चौक से आगे तक फैला हुआ था। इसके अलावा भागलपुर के पिस्ता, सहरसा के पचगछिया आदि में खेती योग्य भूमि, आम के बगीचे और पोखर भी थे। आय इतनी अधिक थी कि बैलगाड़ी पर रुपये-पैसे लादकर राजबाटी लाए जाते थे।

उनका निधन होने पर कुमार सतीशचंद्र बनर्जी के कुशल प्रबंधन में राजबाटी का राजसी वैभव कायम रहा। इनकी तीन पुत्रियां लूना, बीना, सुजाता और एक पुत्र श्रृषचंद्र बनर्जी हुए। पुत्र श्रृष शानू बनर्जी के नाम से जाने गए। कुमार सतीशचंद्र बनर्जी के गुजरने और जमींदारी प्रथा खत्म होने के बाद उनके पुत्र शानू बिंदास हो गए। उन्हें घुड़दौड़ व अयाशी की लत लग गई। वे अपने परिजनों, जिगरी दोस्तों व नौकर-चाकरों के संग कोलकाता जाकर महीनों महंगे होटलों में रहते और रेस में भाग्य आजमाते थे। इसका अकूत खर्च पूरा करने में खेतिहर जमीन, पोखर, जंगल सब बिकने लगे।

भागलपुर विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर बांग्ला विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और बांग्ला के सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. विनय कुमार महाता के अनुसार, अशोक कुमार के ननिहाल के परिवार के एक अन्य वारिस शीला के पुत्र टुलु बाबू तो उनसे भी एक कदम आगे बढ़ गए। उन्होंने लक्ष्मी इंशोरेंस चिट फंट कंपनी खोल ली और भारी नुकसान होने के कारण दिवालिया हो गए। इस तरह धीरे-धीरे राजबाटी का राजसी ठाठबाट बीते दिनों की बात हो गई। बाद में शानू बनर्जी और उनके परिजन राजबाटी के प्रबंधन का भार यहां एक केयर-टेकर के जिम्मे सौंपकर कोलकाता जा बसे। राजबाटी आज भी आदमपुर में शान से खड़ा है, लेकिन उसके मुख पर वह रौनक, वह जीवंतता नहीं है, जो तब थी।
SOURCE - Jagaran

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