फिल्‍म रिव्यू: मसान

कलात्मक नजरिये से बनाई जाने वाली कुछ फिल्में आजकल बरास्ता कान समारोह भारत आती हैं तो उन्हें कुछ ज्यादा ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। बीते कुछ वर्षों में अनुराग कश्यप की 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' और विक्रमादित्य मोटवाणी की 'उड़ान' सरीखी फिल्मों को शायद इसी वजह से कुछ ज्यादा ही पसंद किया गया था। भारत में कला प्रेरित फिल्में बरसों से बनती रही हैं और वह कान समारोह से हो कर आएं, तभी उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाएगा, ऐसा कतई जरूरी नहीं है। कुछ अन्य प्रतिष्ठित समारोहों के मुकाबले कान समारोह बेहद अच्छी फिल्मों के मूल्यांकन का पैमाना हो, ये भी कोई जरूरी नहीं है। इसलिए जब 'मसान' की इस साल वहां स्क्रीनिंग हुई और इसे कई मिनटों का स्टैंडिंग ओवेशन मिला तो कान खड़े होना लाजिमी था कि इस फिल्म में ऐसी क्या बात है, जिस पर फिरंग रीझ गये। डर इस बात का भी था कि कहीं इसका पहनना-ओढ़ना डैनी बॉयल की 'स्लमडॉग मिलेनियर' जैसा तो नहीं है। इस फिल्म के सन्न कर देने वाले ट्रेलर ने जिज्ञासा और उत्सुकता दोनों बढ़ा दी थी लेकिन जब 'मसान' देखी तो एक अच्छी और महान फिल्म का अंतर पता चला।

फिल्म की कहानी अलग-अलग पात्रों के साथ शुरू होती है और फिर एक सूत्र की तरह अंत में आकर इन सब किरदारों के साथ मिल जाती है। शुरुआत में दिखाया गया है कि काशी की रहने वाली एक ब्राह्मण युवती देवी पाठक (रिचा चड्ढा) अपने प्रेमी पियूष से एक होटल में मिलती है। वहां देवी को अश्लील एमएमएस कांड में फंसा दिया जाता है। पियूष उसी होटल के बाथरूम में सुसाइड कर लेता है। मामला पुलिस तक पहुंचता है और देवी के पिता विद्याधर पाठक (संजय मिश्रा) को ये सारा मामला सुलटाने के लिए तीन लाख रुपये का बंदोबस्त करना है। पाठक जी किसी जमाने में कॉलेज में संस्कृत पढ़ाते थे, लेकिन अब घाट पर क्रियाकर्म का सामान बेचते हैं, इसलिए इतने पैसों का इंतजाम उनके बस के बाहर की बात है। किसी तरह से बात किश्तों में पैसा चुकाने पर पक्की हो जाती है।

दूसरी तरफ है एक दलित युवक दीपक (विकी कौशल)। दीपक का पूरा परिवार घाट पर शव जलाने का काम करता है, लेकिन उसके पिता का सपना है कि वह पढ़-लिख कर इंजीनियर बने। दीपक एक होनहार छात्र है और इंजीनियरिंग में उसका सेलेक्शन पक्का है। एक सोशल साइट के जरिये उसे दूसरे इलाके की एक लड़की शालू (श्वेता त्रिपाठी) से प्यार हो जाता है। शालू उच्च घराने की है। देवी और उसके पिता का पैसों के लिए दिन-रात होने वाला संघर्ष और दीपक-शालू की प्रेम कथा सीन दर सीन करवटें बदलती है और फिल्म में एक समां सा बंधने लगता है। तभी एक हादसा दीपक की जिंदगी बदल देता  है। उसके साथ कुछ ऐसा होता है, जो कभी देवी के साथ हुआ था।

दीपक इस झटके से पूरी तरह टूट जाता है, पर घटनाक्रम कुछ इस तरह से बदलता है कि दीपक और देवी एक साथ एक राह पर चल पड़ते हैं।  'मसान' की कहानी कहते हुए यहां कुछ बातें नहीं बताई गयी हैं, क्योंकि उन्हें यहां जाहिर करने से आपका फिल्म देखने का मजा किरकिरा हो सकता है। कहानी और उसे कहने के अंदाज से फिल्म अच्छी है। तमाम कलाकारों का अभिनय, फिल्म का संगीत उत्तम है। सेट डिजाइन, लोकेशन, छायांकन उत्कृष्ट है। निर्देशक ने असली लोकेशंस पर शूट किया है, इसलिए फिल्म वास्तविकता के करीब लगती है। घाट पर शवों का दाह संस्कार आदि सीन्स अच्छे शूट किये गये हैं। खासतौर से पाठक जी का घर, देवी और दीपक के कॉस्ट्यूम्स आदि पर अच्छा काम किया गया है। लेकिन ऐसा क्यों है कि किसी छोटे शहर में अगर लोग सोशल वेबसाइट का इस्तेमाल करते हैं तो दर्शक हंसते हैं। इन सब बातों पर क्या शहरी लोगों का ही सर्वाधिकार है।

हम ये क्यों भूल जाते हैं कि कभी ये तमाम बातें शहरी लोगों के लिए भी अनजानी थीं। और ये कोई डॉक्यूमेंटरी तो नहीं, जो घाट पर शवों के दाह संस्कार करने वालों पर फोकस करती हो। दलित और कुलीन वर्ग के भेदभाव को दर्शाने वाली भी यह कोई पहली भारतीय फिल्म नहीं है। तो फिर इसे पूर्व में आ चुकी इसी तरह की फिल्मों से कैसे अलग किया जा सकता है। 'मसान' आज के संदर्भ में इसलिए एक अच्छी फिल्म कही जा सकती है, क्योंकि आज ऐसी फिल्मों की जरूरत है, जबकि मसाला सिनेमा की आंधी में ऐसी फिल्में गायब हो रही हैं। यानी इसकी उपयोगिता इसलिए नहीं है कि इसे कान समारोह में खड़े होकर सराहा गया। 

कलाकार: रिचा चड्ढा, संजय मिश्रा, विकी कौशल, श्वेता त्रिपाठी, पंकज त्रिपाठी, निखिल साहनी 
निर्देशन: नीरज घेवान
निर्माता: मनीष मुंद्रा, गुनीत मोंगा, विकास बहल, विक्रमादित्य मोटवाणी, अनुराग कश्यप
कहानी: नीरज घेवान, वरुण ग्रोवर
संगीत: इंडियन ओशन
गीत: मयूर पुरी, कौसर मुनीर, शब्बीर अहमद, नीलेश मिसरा 

Source - Hindustan

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